भारतीय साहित्य के विशालतम ऑनलाइन संग्रहालय से कुछ आंकड़े (...और गिनती जारी है!)
कविता कोश: 57000+ कुल पन्नें; 2,000+ रचनाकार; 25,000+ कविताएँ; 10,000+ ग़ज़लें; 3,000+ गीत/नवगीत; 1,500+ नज़्में | 125,000+ आगंतुक/माह; 20,000,00+ रचना-पठन/माह
गद्य कोश: 7,000+ कुल पन्नें; 500+ रचनाकार; 1,500+ कहानियाँ; 600+ लघुकथाएँ; 100+ उपन्यास; 600+ आलेख; 300+ निबंध; | 20,000+ आगंतुक/माह; 1,000,00+ रचना-पठन/माह
अर्ध्य / श्रीप्रकाश शुक्ल
Kavita Kosh से
| मुखपृष्ठ » | रचनाकारों की सूची » | रचनाकार: श्रीप्रकाश शुक्ल |
चांद निकल आया
यही तो कहा था
उस रात
जब माध की चौथ को तुम अर्ध्य दे रही थी
तुम्हारे लिये चांद का यह निकलना
पुतलियों में फँसी हवा का निकलना था
जहाँ रोशनी थी
हरियाली थी
और एक ऐसी आर्द्रता थी
जो तुम्हारे प्रेम से भारी थी
और भरी हुई
निकला हुआ चांद
गाजीपुर की चांदनी से
मुझे बेपर्दा कर रहा था
और मै बनारस की बरसात में भींग रहा था
चांद आज हमारे लिये
उस चकवा की तरह है
जहाँ सिर्फ़ रात है
मुझे इस चंद्रमा के गुज़र जाने का इंतज़ार होगा
तुमसे व सिर्फ़ तुमसे
मिलने के लिये ।