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अश्रु / वाल्ट ह्विटमैन / दिनेश्वर प्रसाद

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अश्रु ! अश्रु ! अश्रु !
रात्रि में, एकान्त में, अश्रु !
श्वेत सागर-तट पर टप-टप-टप गिरते सैकत में सूखते,
अश्रु कोई दीपित तारा नहीं, सर्वतः धूमिल और विषादमय
ढके हुए सिर की आँखों के गीले अश्रु ।
आह् ! कौन है वह प्रेत ? अन्धकार में अश्रुपूर्ण आकृति ?
बहते हुए अश्रु, सिसकते हुए अश्रु उन्मत्त चीत्कारों से अवरुद्ध हूक,
ओ आन्धी, ऊपर उठती हुई साकार, सागर-तट के
समानान्तर तेज़ कदम चलती हुई !
ओ पवन से संयुक्त उन्मत्त और विषण्ण रात्रि झँझावात !
वमन करते और हताश !
ओ छाया ! दिन में सौम्य और मर्यादित,
शान्त मुख और सन्तुलित क़दमों वाली किन्तु दूर, रात्रि में जब तुम उड़ान भरने लगती,
किसी की ओर नहीं देखती — ओ तुम ! तब अनियन्त्रित महासागर —
अश्रुओं का, अश्रुओं का, अश्रुओं का !

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : दिनेश्वर प्रसाद

लीजिए, अब यही कविता मूल अँग्रेज़ी में पढ़िए
                Walt Whitman
                      Tears

TEARS! tears! tears!
In the night, in solitude, tears,
On the white shore dripping, dripping, suck'd in by the sand,
Tears, not a star shining, all dark and desolate,
Moist tears from the eyes of a muffled head;
O who is that ghost? that form in the dark, with tears?
What shapeless lump is that, bent, crouch'd there on the sand?
Streaming tears, sobbing tears, throes, choked with wild cries;
O storm, embodied, rising, careering with swift steps along the beach!
O wild and dismal night storm, with wind — O belching and desperate!
O shade so sedate and decorous by day, with calm countenance
and regulated pace,
But away at night as you fly, none looking — O then the unloosen'd ocean,
Of tears! tears! tears!