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अष्टनायिका / स्वरांगी साने

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शास्त्रीय नृत्य में अवस्था के विचार से नायिका के आठ भेद

 1. प्रोषितपतिका

तुम चले गए हो
यह कहकर कि लौटोगे

उसने भी माना
यही कि
जाने के साथ
जुड़ा होता है लौटना।

2. खण्डिता

तुम्हारे बालों की सफ़ेदी
और गर्दन पर कुछ सलवटें
पर समझ नहीं पा रही
तुम्हारी आँखों की चमक में
किसी और की लौ क्यों है भला?

3. कलहान्तरिता

झगड़ ही ली थी
तो दहल गई थी पृथ्वी।

तुम पर क्या बीती होगी
यह सोच
दहल रही है वो।

जब आग उगली थी
तो इतना ही जाना था
कि भस्म कर देना है सब।

सब भस्म हो गया
बचा रह गया प्यार
जो
फिर-फिर उड़ान भर रहा है
भस्म से
फ़िनिक्स-सा।

4. विप्रलब्धा

तुमने कहा था
आज मिलेंगे
मिलेंगे ऐसे
जैसे कभी न मिला कोई।

वो पहुँच गई मिलने
अपने छोर को आसमान में समेटे
अपनी कौंध को
बिजली में लपेटे।

वहाँ उस जगह
मिल गए
पृथ्वी
गगन
नीर
पवन
अग्निदेव भी
नहीं मिले तो बस
इन पंचतत्वों से बने तुम !

5. उत्कण्ठिता

तुम आओगे
तो सबसे पहले क्या पूछोगे
पूछोगे उसका हाल
या अपने न आने के
कारण गिना दोगे
पर
जब तुम आ जाओगे
तो उन कारणों से क्या
जो तुम्हें रोके थे।

वो
सोच रही है
तुम देखोगे
उन अनगिनत भावों को
जो तुम्हारे आने से
उमड़े थे मन में
जो तुम आओगे ।

6. वासकसज्जा

केतकी, गुलाब, जूही
कल तक ये केवल नाम थे
आज उनकी महक खींच रही है

तुम आने वाले हो
हुलस-हुलस कर
बता रही है घड़ी की सुइयाँ
आओगे न
सैकड़ों बार पूछ रहा है मन
तुम ही जवाब दो
क्या कहूँ उसको।

7. स्वाधीनपतिका

रोटियाँ बनानी हैं
तुम गूँथ देते हो
उसके बाल।
वो कहती है
अरे समझ नहीं आ रहा क्या
पड़ा है चौका-बर्तन
तुम कड़छी
और डोलची
बन जाते हो

उसकी हँसी से
तुम दोहरे होते जाते हो
वो कहती है
जाओ न !

तुम कहते हो

जाओ न !

8. अभिसारिका

यदि दिन हुआ
तो उजले वस्त्रों में जाएगी
रात में पहन लेगी श्याम रंग

वो पूरे शृंगार के साथ जाएगी
ऋतुओं में वसन्त महकेगा
मौसम में
सावन गाएगा
उसके उल्लास का पर्व तुम्हारा अभिसार
और
उसका अधिकार होगा।