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अहो हरि! मो प्राननि के प्रान / हनुमानप्रसाद पोद्दार

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अहो हरि ! मो प्राननि के प्रान।
अब कब पुनि सुन पान्नँगी मैं मुरली की मधु तान॥
कब मुखचंद निहारौंगी पुनि रस-निधि, हौं रसराज !।
कब नव-नीरद तनु परसौंगी छाँडि लोक-कुल-लाज॥
कब त्रिभंग-भंगिमा निरखि पुनि होंगे नैन निहाल।
कब हौं पुनि पहिरावौंगी गल गूँथि मालती-माल॥
कब पुनि ललित पान-बीरी दै अधर करौंगी लाल।
कब मैं पदपंकज-पराग लै तिलक करौंगी भाल॥
अब नहिं सह्यौ जात मो पै यह तेरौ विषम बियोग।
छटपट करत प्रान निकसेंगे, तजि सरीर-संजोग॥