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"आँख जब लगी थी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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बीच राह में छोड़ा
 
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हे प्रभु मेरे
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कुछ ऐसा कर दे !
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सब चुनकर तू
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मेरी झोली भरदे !
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कर देना शीतल
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सब ताप मिटाके
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करना आलिंगन ।
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नई भोर-सा
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तन हो सुरभित
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पोर-पोर में
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भरें गीतों के स्वर
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खिलें प्रेम-अधर ।
 
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08:10, 7 सितम्बर 2019 का अवतरण

19
मिले दो पल
आँख जब लगी थी
हुए ओझल
जब जगे तो देखा-
मिटी जीवन रेखा ।
20
द्वन्द्व घिरा था
जीवन का जंगल
मन विकल
तुमने मिल बाँटे
दु:ख के सब पल ।
21
कहाँ मिलेगा
यह अपनापन,
तुमने दिया,
जो जाने -अनजाने
खुशबू-भरा मन ।
22
नि:स्पृह मन
जब भी कुछ चाहे
ठोकर खाए
पूछे न यहाँ कोई
अपने या पराए ।
23
दूर है चन्दा
ढूँढ़ता है नभ में
अकेला तारा
कभी नज़र आए
तो कभी तरसाए ।
24
भरोसा किया
थे साथी सफ़र के
रहे डरके
बीच राह में छोड़ा
हर विश्वास तोड़ा ।
25
हे प्रभु मेरे
कुछ ऐसा कर दे !
दु:ख मीत के
सब चुनकर तू
मेरी झोली भरदे !
26
व्यथा की साँसें
कर देना शीतल
नयन खिलें
सब ताप मिटाके
करना आलिंगन ।
27
नई भोर-सा
तन हो सुरभित
पोर-पोर में
भरें गीतों के स्वर
खिलें प्रेम-अधर ।
-0-
(8 दिसम्बर-12-28 मई-13)