भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ / इन्दु श्रीवास्तव" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=इन्दु श्रीवास्तव |संग्रह= }} {{KKCatGhazal}} <poem> आए हैं जिस म…)
 
 
पंक्ति 7: पंक्ति 7:
 
<poem>
 
<poem>
 
आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ
 
आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ
रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ
+
रुदादे-सफ़र<ref>यात्रा की कहानी</ref> पूछ मगर रास्ता न पूछ
  
गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले
+
गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले<ref>छाले</ref>
सहरा कहाँ था और कहाँ जलजला न पूछ
+
सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ
  
वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है
+
वाँ<ref>वहाँ</ref> से चले हैं जबसे मुसलसल<ref>निरंतर</ref> नशे में है
 
ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ
 
ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ
  
पंक्ति 21: पंक्ति 21:
 
दीवानगी की आग में क्या-क्या गया न पूछ
 
दीवानगी की आग में क्या-क्या गया न पूछ
  
किसकी तलाश है कैसी हम्द कैसी बन्दगी
+
किसकी तलाश कैसी हम्द कैसी बन्दगी
 
है धूप में कि छाँव में मेरा ख़ुदा न पूछ
 
है धूप में कि छाँव में मेरा ख़ुदा न पूछ
  
 
जब वो नज़र के बीच जले है चराग़-सा
 
जब वो नज़र के बीच जले है चराग़-सा
 
ख़्वाहिश न कोई पूछ कोई इल्तिजा न पूछ
 
ख़्वाहिश न कोई पूछ कोई इल्तिजा न पूछ
</poem>
+
</poem>>
 +
{{KKMeaning}}

22:34, 6 मार्च 2010 के समय का अवतरण

आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ
रुदादे-सफ़र[1] पूछ मगर रास्ता न पूछ

गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले[2]
सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ

वाँ[3] से चले हैं जबसे मुसलसल[4] नशे में है
ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ

वाक़िफ़ नहीं है इश्क़ की पेचीदगी से तू
है ये शुरू कहाँ से कहाँ पे सिरा न पूछ

मौसम गए सुकून गया ज़िन्दगी गई
दीवानगी की आग में क्या-क्या गया न पूछ

किसकी तलाश कैसी हम्द कैसी बन्दगी
है धूप में कि छाँव में मेरा ख़ुदा न पूछ

जब वो नज़र के बीच जले है चराग़-सा
ख़्वाहिश न कोई पूछ कोई इल्तिजा न पूछ

>
शब्दार्थ
  1. यात्रा की कहानी
  2. छाले
  3. वहाँ
  4. निरंतर