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"आओ बुनेंगे / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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दीपक की लौ
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गाल पर ढुलका
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जैसे हो आँसू ।
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दबी रुलाई
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बसी परदेस में
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बेटी न आई ।
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भाई जोहता
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आई बहना ।
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पड़ी सुनाई।
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सबसे छुपकर
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गलियारे में ।
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बेटी हुई व्याकुल
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हिरनी जैसी ।
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दीपक जले
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नभ उतरा धरा
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मिलता गले ।
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अँधेरा डरा
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देखकर उजाला
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छुपता फिरा ।
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रोशनी बसी-
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मन नन्हें शिशु की
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दिया जो जला
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था डरा अँधियारा
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उजाला खिला
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मन का तम
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मिटाते रहे तेरे
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मन के दिए ।
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दीप जलाओ
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जो भटके पथ में
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राह दिखाओ ।
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153
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प्रेम -दीप से
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मन में हैं उजाले
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तुम्हीं ने बाले ।
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कब था  डरा ?
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नन्हा -सा दीप यह
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नेह से भरा ।
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आओ बुनेंगे
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उजालों की चादर
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भावों से भर ।
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दुख-पाहुन
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न मन में टिकाओ
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दीप जलाओ ।
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157
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रौशन घर
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बन गया मन्दिर
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पूजा के स्वर ।
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उस वर्षा में
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खूब तैरता है ये
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आँगन सारा
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रिश्तो के नाम
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गिरवी न रखेंगे
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सुबह -शाम ।
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16 
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मिलेगा प्रेम
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तो निभाएँगे हम
 +
सारे ही नेम ।
  
 
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04:37, 19 मई 2019 के समय का अवतरण


140
दीपक की लौ
गाल पर ढुलका
जैसे हो आँसू ।
141
दबी रुलाई
बसी परदेस में
बेटी न आई ।
142
 भाई जोहता
बाट एकटक , न
आई बहना ।
143
नींद थी आई
सपने में सिसका
पड़ी सुनाई।
144
सिसके पिता
सबसे छुपकर
अँधियारे में।
145
 चलते गए
लुटे-पिटे -से पिता
गलियारे में ।
146
पता ये चला -
बेटी हुई व्याकुल
हिरनी जैसी ।
147
 दीपक जले
नभ उतरा धरा
मिलता गले ।
148
अँधेरा डरा
देखकर उजाला
छुपता फिरा ।
 149
 रोशनी बसी-
मन नन्हें शिशु की
बिखरी हँसी
 150
 दिया जो जला
था डरा अँधियारा
उजाला खिला
 151
मन का तम
मिटाते रहे तेरे
मन के दिए ।
152
दीप जलाओ
जो भटके पथ में
राह दिखाओ ।
 153
प्रेम -दीप से
मन में हैं उजाले
तुम्हीं ने बाले ।
 154
कब था डरा ?
नन्हा -सा दीप यह
नेह से भरा ।
155
आओ बुनेंगे
उजालों की चादर
भावों से भर ।
156
दुख-पाहुन
न मन में टिकाओ
दीप जलाओ ।
157
रौशन घर
बन गया मन्दिर
पूजा के स्वर ।
158
उस वर्षा में
खूब तैरता है ये
आँगन सारा
159
रिश्तो के नाम
गिरवी न रखेंगे
सुबह -शाम ।
 16
मिलेगा प्रेम
 तो निभाएँगे हम
 सारे ही नेम ।