भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आजु हरि खेलत खेल नये री! / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:59, 9 जनवरी 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=स्वामी सनातनदेव |अनुवादक= |संग्रह...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राग जैजैवन्ती, तीन ताल 14.7.1974

आजु हरि खेलत खेल नये री!
सरद निसा पूरन ससांक लखि हिय रस-रंग नये उनये री!
रसिकराय रस रास रसनकों व्रजवन वंसी रव गुँजये री!
सुनि-सुनि तुरत चलीं व्रज-वाला, मानहुँ कोउ टोना पठये री!॥1॥
उलटि-पुलटि पहिरे पट-भूसन, उर कछु अद्भुत भाव भये री!
सोहहिं सखियन संग स्याम जनु नखतन[1] विच निसिपति उदये री!॥2॥
उर उछाह उलह्यौ रति-रस को सखियन जब प्रियतम चितये री!
पावन प्रीति मात्रा हैं प्रीतम, तिनि लखि सखि रति-रस उनयेरी!॥3॥
मण्डल रास रच्यौ अति अनुपम, स्याम धरे बहुरूप नये री!
इक गोपी इक स्याम मेखला[2] लखि-लखि सखि! मुनि चकित भये री!॥4॥
होत नृत्य हल्लीस चीजसों, चहु दिसि थेइ-थेइ रव उनये री!
पायल की रुनझुन धुनि-सुनि मुनिजन हूँ अति मुदित भये री!॥5॥
बाजहिं वेनु पखावज वीना, सुनि सुरजन हूँ चकित भये री!
देखि-देखि रस-केलि स्याम की रति-रतिपति के मान ढये री!॥6॥
कबहुँ होत जल-केलि अनूपम, वारि-फुहार मारि उलहे री!
वन-विहार पुनि होत चीज सों, चुनि-चुनि पुहुप पुंज पलुहे री!॥7॥
करहि सुमन सिंगार परस्पर, सुमन फाग के रंग रये री!
होत सुमन रन-रंग ओजसों, चीज भरे ये रसिक रहे री!॥8॥
चिन्मयि केलि रसिक रसपति की, केहि विधि कोउ कवि कहहु कहै री!
जहाँ न मुनिजन हूँ को गति-मति सो रति मो मति कहा सहै री!॥9॥
तदपि स्याम-सर अवगाहन सों मन-मल पल में सकल बहै री!
यासों कहि-कहि ही यह पामर कछु-कछु रति रस-रंग लहै री!॥10॥

शब्दार्थ
  1. तारागण
  2. माला, मण्डल