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आजु हरि खेलत खेल नये री! / स्वामी सनातनदेव

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राग जैजैवन्ती, तीन ताल 14.7.1974

आजु हरि खेलत खेल नये री!
सरद निसा पूरन ससांक लखि हिय रस-रंग नये उनये री!
रसिकराय रस रास रसनकों व्रजवन वंसी रव गुँजये री!
सुनि-सुनि तुरत चलीं व्रज-वाला, मानहुँ कोउ टोना पठये री!॥1॥
उलटि-पुलटि पहिरे पट-भूसन, उर कछु अद्भुत भाव भये री!
सोहहिं सखियन संग स्याम जनु नखतन[1] विच निसिपति उदये री!॥2॥
उर उछाह उलह्यौ रति-रस को सखियन जब प्रियतम चितये री!
पावन प्रीति मात्रा हैं प्रीतम, तिनि लखि सखि रति-रस उनयेरी!॥3॥
मण्डल रास रच्यौ अति अनुपम, स्याम धरे बहुरूप नये री!
इक गोपी इक स्याम मेखला[2] लखि-लखि सखि! मुनि चकित भये री!॥4॥
होत नृत्य हल्लीस चीजसों, चहु दिसि थेइ-थेइ रव उनये री!
पायल की रुनझुन धुनि-सुनि मुनिजन हूँ अति मुदित भये री!॥5॥
बाजहिं वेनु पखावज वीना, सुनि सुरजन हूँ चकित भये री!
देखि-देखि रस-केलि स्याम की रति-रतिपति के मान ढये री!॥6॥
कबहुँ होत जल-केलि अनूपम, वारि-फुहार मारि उलहे री!
वन-विहार पुनि होत चीज सों, चुनि-चुनि पुहुप पुंज पलुहे री!॥7॥
करहि सुमन सिंगार परस्पर, सुमन फाग के रंग रये री!
होत सुमन रन-रंग ओजसों, चीज भरे ये रसिक रहे री!॥8॥
चिन्मयि केलि रसिक रसपति की, केहि विधि कोउ कवि कहहु कहै री!
जहाँ न मुनिजन हूँ को गति-मति सो रति मो मति कहा सहै री!॥9॥
तदपि स्याम-सर अवगाहन सों मन-मल पल में सकल बहै री!
यासों कहि-कहि ही यह पामर कछु-कछु रति रस-रंग लहै री!॥10॥

शब्दार्थ
  1. तारागण
  2. माला, मण्डल