भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दा कहने को है / ज़ौक़

Kavita Kosh से
विनय प्रजापति (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:46, 5 मार्च 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ज़ौक़ }} category: ग़ज़ल <poem> आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दआ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दआ कहने को है
यह नहीं मालूम क्या कहवेंगे क्या कहने को है

देखे आईने बहुत, बिन ख़ाक़ हैं नासाफ़ सब
हैं कहाँ अहले-सफ़ा, अहले-सफ़ा कहने को हैं

दम-बदम रूक-रुक के है मुँह से निकल पड़ती ज़बाँ
वस्फ़ उसका कह चुके फ़व्वारे या कहने को है

देख ले तू पहुँचे किस आलम से किस आलम में है
नालाहाए-दिल[1] हमारे नारसा[2] कहने को है

बेसबब सूफ़ार[3] उनके मुँह नहीं खोंलें है 'ज़ौक़'
आये पैके-मर्ग[4] पैग़ामे-क़ज़ा कहने को है

शब्दार्थ
  1. दिल का रोना
  2. लक्ष्य तक न पहुँचने वाले
  3. तीर का मुँह
  4. मृत्यु का दूत