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आज की दोपहर से अतीत तक / विपिनकुमार अग्रवाल

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हरी कोमल पीपल की पत्ती
झाँकी पत्थर के आँगन की दरार से
हँसते मालिक के सफ़ेद दाँत-सा
आलोकित हुआ नौकर का दुबका मन

यह क्या
जलने लगी
धूप
जैसे मौत की हँसी

घूमी पृथ्वी
फिर से
ग्रह और नक्षत्र
बदलने लगे घर
हिला आसन
इन्द्र का

डगमगाई पृथ्वी
संशय से
बीत गई उम्र
हम सब की
बनने में अतीत