भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आदमी जैसे हो कुछ अजगरों के बीच / प्रकाश बादल

Kavita Kosh से
Dr. Manoj Srivastav (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:48, 23 जून 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: आदमी जैसे हो कुछ अजगरों के बीच। चंदन सी ज़िंदगी है विषधरों के बीच…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आदमी जैसे हो कुछ अजगरों के बीच। चंदन सी ज़िंदगी है विषधरों के बीच।

ये, वो, मैं, तू हैं सब तमाशबीन, लहूलुहान सिसकियां हैं खंजरों के बीच।

शहर के मज़हब से नावाकिफ़ अंजान वो, बातें प्यार की करे कुछ सरफिरों के बीच।

भरी सभा में द्रौपदी-सा चीख़े मेरा देश, कब आओगे कृष्ण इन कायरों के बीच।

ख़ुद ही अब बताएंगे कि हम ख़ुदा नहीं, आज गुफ़्तगू हुई ये पत्थरों के बीच।

आंसू इसलिये आंख से छलकाता नहीं मैं, कुछ मछलियां भी रहतीं हैं सागरों की बीच।