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आदमी / अरविन्द अवस्थी

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न थकीं सदियाँ, न आदमी
चलते-चलते
एक दूसरे के साथ
पेड़ से आसमान तक
पत्तों से रेशमी पोशाक तक की
यात्रा में
क़दम से क़दम मिलाती सभ्यता

साहित्य, संगीत और कला के
विकास का बढ़ता क्रम
तक्षशिला और नालन्दा की
अनुपम ज्ञान परम्परा
खजुराहों का शिल्प
और कोणार्क का कौतुक
विदेशियों को बुलाता
ताजमहल
इन सबके पीछे आदमी ही तो है
पर समझ नहीं आता
आदमी है कहाँ ?

हाथ, पैर, मुँह, नाक
कान, ऑंख ये तो
आदमी नहीं हैं
फिर क्या सिर या पेट आदमी है ?
इतना बड़ा समाज बनाने वाला
आदमी आज समाज से
स्वयं गायब है
ढूँढ रहा हूँ
एक अदद आदमी
वह कहाँ मिलेगा ?

स्कूलों में, फ़ैक्टरियों में
खेतों में या बाज़ारों में,
नहीं,
वहाँ तो विद्यार्थी, अधिकारी
कर्मचारी मिलते हैं
सामान मिलता है
या फिर उगती हैं फ़सलें,
आदमी पैदा नहीं होता
आदमी बनता है
संवेदना की भट्ठी में
सिझता है
अंदर ही अंदर पकता है
तब आदमी बनता है
ढूँढ रहा हूँ ऐसा आदमी
जो आदमी के लिए
जीता है