भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आरति भक्तकल्पतरु हरि की / हनुमानप्रसाद पोद्दार

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:49, 29 अक्टूबर 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=हनुमानप्रसाद पोद्दार |अनुवादक= |स...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

(राग कान्हरा-ताल कहरवा)

आरति भक्तञ्कल्पतरु हरि की।
 दनुज-दर्पहर नर-केञ्सरि की॥
 रूप भयानक स्तभविदारी,
   असुर हिरण्यकशिपु-संहारी,
     भक्त-हेतु अद्भुत तनुधारी,
       सुरवन्दित प्रभु सर्वोपरि की॥
 मंगलमय सब मंगलकारी,
   शरणागत-वत्सल भयहारी,
     सौयरूप जन-हृदय-विहारी,
       अघतरु-मूलोत्पाटक करि की॥
 अखिल विश्व-शोधक मलहारी,
   जनप्रहलाद सुहृद सुखकारी,
     जयति जयति जय जय दैत्यारी।
       चिदानन्दमय तमहर-हरि की॥