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"आलू पर्व / मनोज श्रीवास्तव" के अवतरणों में अंतर

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मनाएँ हिल-मिल,
 
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तुम्हारे लिए एक दिन
 
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16:45, 3 सितम्बर 2010 के समय का अवतरण

आलू पर्व

इतिहास की खुफिया आँखें भी
तुम्हें चीन्ह नहीं पाईं
कि तुमने ही मिटाई है
असंख्य समाजों की अनाकलित भूख,
पाले हैं कितनी ही कालकवलित-कालजयी
सभ्यताओं के दुर्गम जंगल,
पोसी हैं उनमें विराट वृक्षाएं
जिन्हें मातृत्त्व से ऊर्जस्व कर
खिलाएं हैं खरबों मानव-फल

हाय! फिर भी
हम नहीं गाते तुम्हारे प्रशस्ति-गान
कि तुमने अक्षुण रखी है
विधाता की शान,
ओर से छोर तक
उदराग्नि को सींचा है
तृप्ति-जल से,
सच, तुमने बचाई है
अन्नपूर्णा की लाज,
बचाया है उसका गुरुर
कि तुम्हारे बगैर ही अनन्त तक
वह पाल लेगी सृष्टि को,
पर, वह तुम्हारे अवतार से पहले
अपनी लोकपोषक शक्ति को
फुस्स पा रही थी,
तुम्हें उपेक्षित कर
शर्मसार हो रही थी

पुराणों के सहस्र चक्षु भी
देख नहीं पाए तुम्हें
सहस्राब्दियों तक,
तब तुम अवतरित हुए
तथाकथित अनार्य देशों में
किसी लातीनी अमरीका में
या, हिमाच्छादित तुंगप्रदेशों पर
और धीरे-धीरे विस्तारित होते गए
समूचे भूमंडल पर,
बिला-परहेज तुमने फैलाए
अपने वरद हस्त
सम्पूर्ण धरा पर,
मिटाए राष्ट्रों के भेदभाव--
इस संकल्प के साथ
कि जीवन को बुझने नहीं देना है,
पालना है--मित्र और शत्रु को साथ-साथ
जोड़ना है--उनके विषम सौतेले दिलों को

घोर विस्मय!
कि तुम्हें छू नहीं पाया क्यों
अहंकार का विघातक ज्वर,
इतराए नहीं तुम
अपनी सृजन-शक्ति पर,
जब तुमने छितराए
अपने बीज कोने-कोने,
जीने का सलीका भी
आया हौले-हौले,
शहंशाहों, मोनार्कों की थालियों में सजते ही
तुमने बदल डाले उनके विचार,
बना डाला उन्हें
समाजवाद का कर्णधार

तुम आए
समाजवाद आया,
तुम आए
प्रजातन्त्र आया,
तुम आए
लोककल्याण का विगुल बजा,
तुम आए
जीवन में समता का रसपाक हुआ

पर, हाय!
एहसान-फरामोश इन्सान
करता ही रहा निर्लज्ज गुमान,
तुम्हारा पौष्टिक समाजवाद
पचा-खचा कर भी
बना ही रहा निरंकुश शैतान,
उसने हिंसक धर्म
और आत्मघाती सम्प्रदाय बनाए,
हृदयविभाजक-भूविच्छेदक सरहद बनाए,
दर्पित-दम्भित राष्ट्रों में
बेईमान हुक्मरान बैठाए,
जिन्होंने जिस्म और जान से लेकर
जल-थल-नभ के कोमल प्रदेश रौंदे
सहचारी दिलों के संजोए घरौंदे खोदे

तुम निर्विकार अनार्यज
प्रतिष्ठित हुए आर्य संस्कृति में,
शामिल हुए हमारी आदतों में,
व्रत-पूजा-अनुष्ठान-संस्कार पर
तुम्हारी भोली स्वीकार्यता हुई सवार,
तुम सिद्ध-सिद्धान्त से
हो शूद्र वर्ण के,
किन्तु, तुम्हें खूब अपनाया है
शांडिल्यों ने,
सारे तर्कहीन कुतर्क तोड़ डाले हैं
पाखंडियों ने,
आखिर, तुमने तय ही कर दिया
एक अपराजेय धर्म
अर्थात, क्षुधाशमन ही है
सबसे बड़ा पुनीत कर्म

आह! हमने
सेक्सी फूलों, हिंसक जानवरों
आलसी चांद-सितारों
को बनाए--
अपने प्रतीक-चिह्न हजारों,
असंख्य शोषितों-अशिष्टों
की मनाई वर्षगांठ
और अर्पित की श्रद्धांजलि
वर्षवार-अनंतवार,
सृष्टि-ध्वंसकों के किए वन्दन-नमस्कार,
समय के सभी ३६५ घरों में बैठाए
अपंग, अलहदी भगवान

वाकई! हम रहे
कितने नादान!
कि नहीं मांगी तुमसे
अपनी पहचान,
नहीं विचारा
कि कब हुआ आलू अवतार
नहीं मनाया
कभी कोई आलू-पर्व
नहीं तय किया
कोई आलू-दिवस,
सो, आज के दिन
आओ! हम सब
मनाएँ हिल-मिल,
तुम्हारे लिए एक दिन
एक वार्षिक पर्व,
उदघोषित करें--
एक राष्ट्रीय अवकाश
एक विश्व दिवस!

(रचना-काल: मार्च, २००४)