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इधर उधर क्यों भटक रहा मन-भ्रमर / हनुमानप्रसाद पोद्दार

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(लावनी, धुन लावनी-ताल कहरवा)
 
इधर उधर क्यों भटक रहा मन-भ्रमर, भ्रान्त उद्देश्य विहीन।
 क्यों अमूल्य अवसर जीवनका व्यर्थ खो रहा तू, मतिहीन॥
 क्यों कुवास-कंटकयुत विषमय विषय-बेलिपर ललचाता।
 क्यों सहता आघात सतत, क्यों दुःख निरन्तर है पाता॥
 विश्व-वाटिकाके प्रति-पदपर भटक भले ही, हो अति दीन।
 खाकर ठोकर द्वार-द्वारपर हो अपमानित, हीन-मलीन॥
 सह ले कुछ संताप और, यदि तुझको ध्यान नहीं होता।
 हो निराश, निर्लज्ज भ्रमण कर फिर चाहे खाते गोता॥
 विसमय विषय-बेलिको चाहे कमल समझकर हो रह लीन।
 चाहे जहर-भरे भोगोंको सलिल समझकर बन जा मीन॥
 पर न जहाँतक तुझे मिलेगा पावन प्रभु-पद-पद्म-पराग।
 होगा नहीं जहाँतक उसमें अनुपम तव अनन्य अनुराग॥
 कर न चुकेगा तू जबतक अपनेको, बस, उसके आधीन।
 होगा नहीं जहाँतक तू स्वर्गीय सरस सरसिज-‌आसीन॥
 नहीं मिटेगा ताप वहाँतक, नहीं दूर होगी यह भ्रांति।
 नहीं मिलेगी शांति सुखप्रद, नहीं मिटेगी भीषण श्रांति॥
 इससे हो सत्वर, सुन्दर हरि-चरण-सरोरुहमें तल्लीन।
 कर मकरंद मधुर आस्वादन, पापरहित हो पावन पीन॥
 भय-भ्रम-भेद त्यागकर, सुखमय सतत सुधारस कर तू पान।
 शान्त-‌अमर हो, शरणद चरण-युगलका कर नित गुण-गण-गान॥