भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

इश्क़ की मस्ती / नज़ीर अकबराबादी

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:46, 15 सितम्बर 2013 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह<ref>बादशाह, शासक</ref> बज़ीरी<ref>मंत्री</ref> है बाबा ।
नै रोना है नै धोना है नै दर्द असीरी<ref>ऊँचा, तेज़</ref> है बाबा ।।
दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी<ref>छोटा, थोड़ा</ref> है बाबा ।
जो आशिक़ हैं सो जानें हैं यह भेड फ़क़ीरी है बाबा ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी<ref>रंज, दुख</ref> है बाबा ।।१।।

है चाह फ़क़त एक दिलबर की फिर और किसी की चाह नहीं ।
एक राह उसी से रखते हैं फिर और किसी से राह नहीं ।
यां जितना रंजो तरद्दुद<ref>सोच</ref> है हम एक से भी आगाह नहीं।
कुछ करने का सन्देह नहीं, कुछ जीने की परवाह नहीं ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।२।।

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद<ref>न्याय, इंसाफ़</ref> नहीं फ़रयाद नहीं।
कुछ क़ैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ जब्र<ref>अत्याचार, किसी बात के लिए मजबूर करना</ref> नहीं, आज़ाद नहीं ।।
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं ।
हैं जितनी बातें दुनियां की सब भूल गए कुछ याद नहीं ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।३।।

जिस सिम्त नज़र भर देखे हैं उस दिलबर की फुलवारी है ।
कहीं सब्ज़ी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलकारी<ref>बेल-बूटे बनाने का काम</ref> है ।।
दिन-रात मगन ख़ुश बैठे हैं और आस उसी की भारी है ।
बस आप ही वह दातारी हैं और आप ही वह भंडारी हैं ।।
 
               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।४।।

नित इश्रत<ref>ख़ुशी</ref> है, नित फ़रहत<ref>ख़ुशी</ref> है, नित राहत है, नित शादी है ।
नित मेहरो करम<ref>कृपा</ref> है दिलबर का नित ख़ूबी ख़ूब मुरादी है ।।
जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का हर चार तरफ़ आबादी है ।
हर रात नई एक शादी है हर रोज़ मुबारकबादी है ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।५।।

है तन तो गुल के रंग बना और मुँह पर हरदम लाली है ।
जुज़ ऐशो तरब<ref>हर्षोल्लास</ref> कुछ और नहीं जिस दिन से सुरत संभाली है ।।
होंठो में राग तमाशे का और गत पर बजती ताली है ।
हर रोज़ बसंत और होली है और हर इक रात दिवाली है ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।६।।

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं वह दिलबर सबसे आला है ।
उसने ही हमको जी बख़्शा उसने ही हमको पाला है ।।
दिल अपना भोला-भाला है और इश्क़ बड़ा मतवाला है ।
क्या कहिए और ’नज़ीर’ आगे अब कौन समझने वाला है ।।

               हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
               जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।७।।

शब्दार्थ
<references/>