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इसकी करो दवाई / राकेश रंजन

इसकी करो दवाई
इसको भेजो अभी आगरा, बहुत हुआ रे भाई

कभी साँड़-सा डकर रहा यह, कभी गधे-सा रेंके
चढ़ा मुल्क के महामंच पर लम्बी-लम्बी फेंके
झाँसा देने में उस्ताद, महाझूठों का राजा
जुमलेबाजी का भोंपू है, घन घमण्ड का बाजा
औषध कहकर ज़हर बेचता, खोले ठगिन दुकनिया
दिखता है नटराज-सरिस नौटंकीबाज नचनिया
ऐसा जोकर, ऐसा लीचड़, ऐसा फूहड़, हलका
अधजल गगरी ! नगरी-नगरी घूमे छलका-छलका

प्रेमरंग को क्या समझेंगे किसी ढंग के संघी
वर्तमान को मूड़ेंगे दिखला भविष्य की कंघी
तर्क-बुद्धि-विज्ञान आदि से इनकी कभी न बननी
ये कहते — इनकी ही पोथी हर विद्या की जननी
इनकी पाली गौएँ भी बरसातीं कृपा बरोबर
वैज्ञानिक शोधों-निष्कर्षों पर कर देतीं गोबर
ये गाँधी के हत्यारे की पूजा करनेवाले
वर्णवाद के रक्षक, नारी-पक्ष कतरनेवाले

इनका ही वंशज गुजराती यह हिटलर का नाती
ध्वस्त पसलियों सम्मुख ताने छप्पन इंची छाती
जबसे इसने छल-बल-कल से पाई चौकीदारी
पिटी बंधुता, लुटी एकता, छुट्टा फिरें शिकारी
भूखों-सूखों को सुलगाकर अपना फुलका सेंका
किया स्वच्छ भारत इसने जनहित बुहारकर फेंका
ख़ुद से भिन्न विचारों के सिर देशद्रोह मढ़वाए
सब रंगों पर एक रंग केवल भगवा चढ़वाए

आओ भारत भाई, सब मिल इसकी छुट्टी कर दो
इसके खून-सने मुख पर कालिख से पुट्टी कर दो
रंजन भैया बोल रहे हैं — ई सबके सनकाई
संविधान के भाँड़ भसाई, आपन देस नसाई

इसकी करो दवाई, भैया
इसकी करो दवाई!