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उमाशंकर जोशी / परिचय

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उमाशंकर जोशी का स्मरण कराता विष्णु पंडया एवं पंकज त्रिवेदी का आलेख

"संस्कारमूर्ति उमाशंकर के लिए शब्द एक "अग्निदिव्य" का स्वरूप था : वह कवि थे, नाटक लिखे, कहानियाँ दी, एक उपन्यास पर हाथ आज़माया, अनुवाद किए, "संस्कृति" के तंत्री-सम्पादक बने, निबंधों का सर्जन किया, शांतिनिकेतन के कुलपति बने और ज्ञानपीठ का प्रथितयश सम्मान प्राप्त किया, गुजराती साहित्य परिषद् को प्रतिष्ठा दी,

गुजराती साहित्य के इतिहास में प्रथम श्रेणी के कवि स्वर्गीय उमाशंकर जोशी की जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी स्मृति में हम कैसे उत्सव मनाएँगे? अकेले कवि उमाशंकर के ही रूप में? "विश्वशांति" उन्होंने गुजरात विद्यापीठ में रचा था और "हूँ गूर्जर भारतवासी !" ऐसा भी गाया । वह सच, मगर उमाशंकर की अकेले कवि के रूप में पहचान आधी-अधूरी होगी । गुजरात के ईडर के पास बामणा गाँव में जन्मे मूलत: उमियाशंकर, उमाशंकर बनाकर छा गए वह बात ख़ुद उन्होंने ही कही थी : "शब्द लेकर मैं निकला था और कहाँ कहाँ पहुँचा ।" संस्कारमूर्ति उमाशंकर के लिए एक "अग्निदिव्य" का स्वरूप था : शीतल, वेदनासिक्त और उजास को पाने मथता शब्द । उसमें विश्व की शांति की रणकार हो तो जठराग्नि भभकने का पुण्य प्रकोप भी, शिक्षक कवि एसा भी पूछ लेंगे कि देश तो आज़ाद होते हो गया, तो क्या किया? इस नागरिक धर्म ने कवि को एकल डंडिया (अकेलेपन) महल के बाहर ज़मीन पर, भीड़ में ले जाने का बल दे गया । इसीलिए वह कवि थे, नाटक लिखे, कहानियाँ दी, एक उपन्यास पर हाथ आज़माया, अनुवाद किए, "संस्कृति" के तंत्री-सम्पादक बने, निबंधों का सर्जन किया, शांतिनिकेतन के कुलपति बने और ज्ञानपीठ का प्रथितयश सम्मान प्राप्त किया, गुजराती साहित्य परिषद् को प्रतिष्ठा दी ।

मगर ये सब तो कुछेक पड़ाव थे । उनका स्मरण सांप्रत चेतना के अनुबंध को करना चाहिए । सद्भाग्य से एकल डंडिया महल में रहकर साहित्य पंडित होने उन्हों ने और उनके समकालीन में से साहित्यकार-शिक्षाकारों ने पसंद नहीं किया था । इंदुलाल याज्ञिक आत्मकथा के भी नायक रहे, जयंति दलाल ने साहित्य के समान्तर महागुजरात आन्दोलन का नेतृत्त्व किया, एस. आर. भट्ट ने शिक्षा-साहित्य के साथ समाज जीवन में भी झुकाया था ।

याद आया कि गुजरात यूनिवर्सिटी बिनशैक्षिक स्थापितों का मैदान बन जाय उसके सामने उमाशंकर जंग में कूद पड़े थे और उपकुलपति के पद पर रहे थे? वह समय इसलिए भी याद है कि उस वक्त हम एम.ए. के भाषा भवन के छात्र थे । उमाशंकर जोशी उपकुलपति पद की कुर्सी पर से सीधे एम. ए. के वर्ग में पढ़ाने भी आते और "गांधीजी की आत्मकथा" का अनुशीलन भी करवाते । फिर तो आजोल के ज्ञानसत्र में साहित्य चर्चा में गांधी और सार्त्र के बारे में थोडा कुछ बोला था, तो भोजन के समय उन्होंने बारीक आँखों से पूछा; "तुमने गांधी को इसे स्वरूप में कहाँ से जाना?" मैंने प्रत्युत्तर दिया; "मैं एम. ए. में आपका छात्र था और..." वाक्य पूर्ण करने से पहले ख़ुशी से हुए लाल चहरे के साथ, प्यार से बोले; "माने गांधी को इस तरह सीखाया था?" इतनी ही सहजता से मैंने जबाब दिया : "आप ही कहते थे न कि जितनी जिसकी समाज होगा, उतना और ऐसा सीखेगा !

नव निर्माण आन्दोलन के द्वारा विधानसभा का विसर्जन और चुनाव के समय क्या ऐसा विचार विपक्ष में शुरू हुआ था । संयुक्त परिबल के बीना कोइ चारा नहीं था । उमाशंकरभाई को कांग्रेस का कोई अच्छा अनुभव नहीं था । जनसंघ के प्रति सहानुभूति कैसे हो ? उन दिनों में अटलबिहारी वाजपेयी अहमदावाद आ रहे थे । उनकी सम्मति लेकर निर्णय किया कि कहीं भोज में उमाशंकरभाई, बी.के. मजमुदार और अटलबिहारी वाजपेयी साथ हो, एकदूसरे के विचारों की और मतभेदों की चर्चा हो । शाहपुर में एक कार्यकर्ता के घर भोज कार्यक्रम हुआ । बी.के. मजमुदार आ सके नहीं (बाद में उनके घर जाकर एक घंटे चर्चा चली । बी.के. तो एक ज़माने के समाजवादी, पक्षों से दूर मगर राजनीति की पूरी समझ । ) आश्चर्य के बीच उमाशंकर आये । वाजपेयीजी, उमाशंकरभाई, वसंतराव और मैं - इस तरह हम चारों एक ही आसन पर ! कवि उमाशंकर के पास तब "सार्थक गुजरात" का कैसा नक्शा था, उसका अंदाज़ मुझे आया ।

सब जाने के बाद अटलजी ने कहा; "ये कवि केवल नहीं है, कवि-मनीषी भी है !"

उसके बाद संयुक्त शक्ति की सफल क़वायद शुरू हुई । जनसंघ के प्रति अस्पृश्यता टूटने की शुरुआत तब से ही हुई । जनता मोर्चे से पूर्व ये संयोग रहा । फिर सरदार भवन, भद्र में बैठक होने लगी । कुछ बातों से उमाशंकर दु:खी होते थे । एकबार तो एक प्रस्ताव को "ख़ाली कागळीयुं !" (सिर्फ़ कोरा कागज़! ) कहकर उसे फाड़ने का प्रकोप भी दिखाया । बैठक के बाद भवन के बाहर एक पेड़ के नीचे खड़े रहकर हमें - चीमनभाई शुक्ल और मैं - उन्हों ने भावी गुजरात के लिए क्या होना चाहिए, ऐसे राजनीतिज्ञ थीगली (चकती) न चले, ऐसे ह्रदय का बोज भी हल्क़ा किया !

सांप्रत के साथ अनुबंध का सबसे स्मरणीय प्रकरण तो राज्यसभा में उमाशंकर का था ! 26 , जून, 1975 की आतंरिक इमर्जेंसी कटोकटी और प्रिसेन्सरशिप बाद के संसद सत्र के दौरान उनकी स्थिति असमंजस से भरी थी । संसद में उन्हों ने उद्वेगभरी आवाज़ से इमर्जन्सी का विरोध किया था । कहा उन्हों ने - "मुझे माफ़ करना बेबाक बोलने के लिए । मेरा और मेरे जैसे जो लोग युवानी में, कालेज के दिनों में स्वतंत्रता के लिए जूझ रहे थे उनके विचार (आपसे) अलग है ।"

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा: , न ते वृद्धा: ये न वदति धर्मम !

जहाँ वृद्ध नहीं वह सभा नहीं, और सच बात या धर्म की बात न बोले वह वृद्ध नहीं । शब्द आज बिना अर्थ के हो गए है । शब्द के बीना मेरा जीवन नहीं.... मगर शब्दों से क्या हो सकता है? आज इस देश में ऐसे मुकाम पर पहुँचे है, जहाँ जीवन का व्यापक सत्य ज़ल्दी से ख़त्म हो रहा है ।