भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

उम्मीद की नदी / कविता भट्ट

Kavita Kosh से
वीरबाला (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:18, 24 सितम्बर 2019 का अवतरण ('{{KKRachna |रचनाकार=कविता भट्ट |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem>...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क़ामयाबी भिखारन हुई; कि मुठ्ठियाँ भिंची हुई हैं।
खोजो न कोई हमदर्द, कि तलवारें खिंची हुई हैं।

हुनर सरेआम ठोकरें खाता यहाँ, फुटपाथ पर।
कौड़ियों का हुस्न हावी है, इश्को- जज़्बात पर।

महफिलें उठ चुकीं, पर्दा भी गिर गया साहब।
कौन किसकी बात कहे, जब है ज़ुबाँ गायब।

यह शहर हो चुका है- अंधा, गूँगा और बहरा।
मन के राग गाना जुर्म, सपनों पर घोर पहरा।

मगर उम्मीद वह नदी है, जो सागर तक जाएगी।
घने अँधियारे में भी, गरिमा सँवर कर दिखाएगी।