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उस बस्ती में / उर्मिल सत्यभूषण

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मैं रोज उधर से गुजरती हूँ
बस्ती और विद्यालय की
दीवार के बीच की पगडंडी
को फलाँगती हूँ जल्दी-जल्दी
उस एकाध फलांग की दूरी
को रोज मापना एक मजबूरी है
नाक सिकोड़ते हुए
आँख मींचते हुए
कदम बचाते हुए चलना
एक दहशत को टालते हुए
छाती पर धुकधुकाते हुए
प्रश्नों को नकारते हुए
आगे बढ़ जाना
एक आदत बन गई है।
धुआँती हुई अँगीठियां
कुल्ले, दातुने, पीकें-थूकें
खाँसते खँखारते बूढ़ों के
बलगामी थक्के
टूटे प्यालों में कलूटी चाय
की चुस्कियाँ
कुछ
चना चबेनों के फक्के
अधजगी बस्ती
रिरियाते सींख से
बच्चे, चूल्हे के पास
ही फारिग होते-
देखते ही उबकाइयां आतीं
गले में अटकती उल्टी।
उसी गंदी, कीचड़ मिट्टी में
सन को लथेड़ते हुये
रस्सियाँ बंटते लोग
लुगाइयाँ
केवल पलभर
को खींचते हैं ध्यान
सिर उठाते हैं कई सवाल
पर वहीं उनका घोंट कर गला
आगे बढ़ जाती।
फिर न रहना भान।
अपने काम में मैं व्यस्त हो जाती
फिर दोबारा, दूसरे दिन
दीखते वही दृश्य
घिनौने वीभत्स
झुग्गियों पर चीथड़ें
लटके हुये। फुनगियों पर
प्रश्न से अटके हुये
बच्चे, बूढ़े मिट्टी में सोये हुए
सिमटे हुए। नवविवाहित
जोड़े भी लिपटे हुए।
मध्यवर्गी चेतना त्रस्त हो जाती
जुगुप्सा-घृणा के भाव जगते
आँख मींचे, नाक पर रूमाल रखे
जल्दी-जल्दी पार कर जाती
गँधाती सड़ी हुई
बदरंग बस्ती को।