भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

उस रस्क-ए-मह को याद दिलाती है चाँदनी / ग़ुलाम हमदानी 'मुसहफ़ी'

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता २ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:55, 19 जून 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ग़ुलाम हमदानी 'मुसहफ़ी' |संग्रह= }} {...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उस रस्क-ए-मह को याद दिलाती है चाँदनी
हर रात मुझ को आ के सताती है चाँदनी

आब-ए-रवाँ में हुस्न मिलाती है चाँदनी
हर मौज में घटी नज़र आती है चाँदनी

जा बैठते हैं हम लब-ए-दरया पे जब कभू
क्या झमके अपने हम को दिखाती है चाँदनी

समान-ए-बज़्म-ए-बादा मैं करता हूँ जिस घड़ी
आ चाँदनी का फ़र्श बिछाती है चाँदनी

सहरा में जा के देख के हर रूद-ए-ख़ुश्क को
हम रंग-ए-जू-ए-शीर बनाती है चाँदनी

जब देखती है दूध सा पिण्डा मेरा मियाँ
ख़जलत से आब ही हुई जाती है चाँदनी

प्यारे अँधेरी रातें हैं ऐसे से मिल ले तू
फिर वर्ना चाँद चढ़ते ही आती है चाँदनी

गर वो भी क़द्र-दाँ हो तो बे-जज़्ब-ए-तलब
रूठे हुए सनम को मिलाती है चाँदनी

क्यूँकर न मैं जलूँ शब-ए-हिज्राँ में ‘मुसहफ़ी’
बिन यार मेरे जी को जलाती है चाँदनी