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एक चीख़ के दायरे में / आरती मिश्रा

यूँ तो गूँगे हो जाने की हद तक चुप रही मैं
इस बीच, एक आत्मयुद्ध चलता रहा
कि निश्चित कर पाना
चीख़ने और गूँगे हो जाने के बीच का कुछ... कुछ

यही ‘कुछ’ तलाशते एक दिन
चीख़ उठी
बस्स्स्स ! बहुत हो गया
मेरी चीख़ गरम हवाओं में धुलकर
चौतरफ़ा फैल चुकी थी

इस दौरान हवाएँ बेशक थोड़ा धीमे-धीमे बहीं
क़दमों ने कुछ तय कर लिया था शायद
वे निहायत तेज़ और तेज़ चले
मुझे मंज़िल का पता-ठिकाना मालूम ना था

मेरी घरघराती आवाज़ थोड़ी कम हुई तो
ख़ुद को उस पहाड़ के पास खड़ा पाया
जिसे सपनों के वार्डरोब में
तहाकर रख दिया था
आज बाँहें फैला दीं
गले से लगा दिया
चूम लिया माथे को

यह सपना जागरण की अमानत है
सोती आँखों में भी जागते रहनेवाला
वह अब पहाड़ की चोटी को जूम कर रहा है
यह सब एक चीख़ के दायरे में घटता गया