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एक मंज़र / परवीन शाकिर
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कच्चा-सा इक मकाँ, कहीं आबादियों से दूर
छोटा-सा इक हुजरा, फ़राज़े-मकान पर
सब्ज़े से झाँकती हुई खपरैल वाली छत
दीवार-ए-चोब पर कोई मौसम की सब्ज़ बेल
उतरी हुई पहाड़ पर बरसात की वह रात
कमरे में लालटेन की हल्की-सी रौशनी
वादी में घूमता हुआ इक चश्मे-शरीर[1]
खिड़की को चूमता हुआ बारिश का जलतरंग
साँसों में गूँजता हुआ इक अनकही का भेद !
शब्दार्थ:
- ↑ शरारती झरना