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एक साँझ / महेन्द्र भटनागर

जीवन
अर्थ-सूनापन !
नहीं कुछ भी नया
सदा-सा
आज भी दिन ढल गया !

भटकती धूप
आयी,
कुछ क्षण
चाहा बिताएँ साथ
पर, अँधेरा ही
आया हमारे हाथ !

डोलते आये विहंगम,
चित्रवत्
देखते केवल रहे हम !
नहीं कोई रुका
सदा-सा
एकरस बहता रहा,
बोझिल मन थका
सहता रहा !
जीवन
अर्थ-सूनापन,
सूनापन !