भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ऐसे कपटी श्याम / ब्रजभाषा

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:25, 27 नवम्बर 2015 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

ऐसे कपटी श्याम कुंजन बन छोड़ चले उधो ३
जो मैं होती जल की मछरिया
श्याम करत स्नान चरण गह लेती मैं उधो /ऐसे कपटी ----2
जो मैं होती चन्दन का बिरला
श्याम करत श्रृंगार मैथ बिच रहती मैं उधो /ऐसे कपटी -----2
जो मैं होती मोर की पांखी
श्याम लगाते मुकुट मुकुट बिच रहती मैं उधो /ऐसे क पटी ----2
जोमें होती तुलसी का बिरला
श्याम लगाते भोग थल बिच रहती मैं उधो /ऐसे कपटी -------2
जो मैं होती बांस की पोली
श्याम छेड़ते राग अधर बिच रहती मैं उधो /ऐसे कपटी-----2
जो मैं होती बन की हिरनिया
श्याम चलते बाण प्राण तज देती मैं उधो /ऐसे कपटी -----2