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कई बार पहले भी उलझी नज़र (दूसरा सर्ग) / गुलाब खंडेलवाल

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कई बार पहले भी उलझी नज़र
हसीन एक-से एक देखे मगर
किसीने न दिल यों छुआ था कभी
न बेचैन मैं यों हुआ था कभी
पिघल बर्फ-सा प्यार की आँच से
लहू धमनियों में लगा नाचने
दिखा जैसे मूसा की आँखों को तूर
मिले ज्यों किसी को पड़ा कोहेनूर
कभी पुरुरवा का हुआ था ये हाल
दिखी जब उसे उर्वशी खोले बाल
कभी इंद्र को जिसने भरमाया था
वही हुस्न ज्यों सामने आया था
गए आप ही मेरे रुक-से क़दम
उठा जाग सीने में सदियों का ग़म
छिपी धड़कनों में जो दिल की रही
खड़ी थी निगाहों के आगे वही
मैं बेताबियाँ दिल की कैसे कहूँ!
लगा बस उसे देखता ही रहूँ
गयी छूट जो उस जनम में कहीं
लगा जैसे वह आ गयी है यहीं
बहुत दूर घर से मिली आज है
मेरी रूह की ही ये आवाज़ है
इसे पा गया हूँ बड़े भाग से
कहीं अब न फिर यह किनारा करे
कुछ ऐसा ही आलम था उस ओर भी
निगाहें थीं पकडे गयी चोर की