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कतना जुगो सें रोज अधरोॅ के अमृत / अनिल शंकर झा

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कतना जुगो सें रोज अधरोॅ के अमृत
पीर्ल्हो पर प्यास आरो बढ़लै निरंतर।
कल्पवृक्ष ठीयाँ ठौर राखर्ल्हो पेॅ भुखले छी
भोगोॅ के ई भावना छै कैहनोॅ चिरंतर।
रोज ताजा फूल रूप रंग गंध लेनेॅ आबै
रोज रोज लुटल्हौ पेॅ लालसा प्रखरतर।
कोन धूप छाँव के ई खेल खेलै सकुनी ना
केकरा कारण काँपै द्रोपदी केॅ अंतर॥