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कमल / ‘हरिऔध’

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ऊपर नभ नीलाभ रक्त रविबिम्ब विराजित।
ककुभ परम रमणीय रागद्वारा आरंजित।
नीचे पुलकित हरित लता तरु पूरित भूतल।
नवश्यामल तृणराजि बड़े कमनीय फूल फल।
बहु विकच सरोरुह से लसित कान्त केलि खगकुल बलित।
कलकल कलकल रव मुखरित सरिकलिन्द तनया कलित।1।

रविजा में हैं सोह रहे सोपान मनोहर।
उन पर हैं लसरही युगल ललना अति सुन्दर।
हैं तनके वरवसन विभूषण बड़े निराले।
हैं सिर पर जल कलश नयन हैं रस के प्याले।
सामने जलद तन हैं खड़े कर आकुल लोचन सफल।
निज कमलोपम कर में लिये दो कमनीय विकच कमल।2।

उनका सुमधुर कंठ मधुरिममय कर मानस।
बरसा रहा है पूत प्रकृति पर परम रुचिर रस।
सानुराग कर ललित राग रंजित नभतल को।
सरस सरस अति सरस कर रहा है सरिजल को।
वह गोपबल को धोनु को विहगवृन्द को कर सुखित।
कलकूल विलसिती बाल को बना रहा है बहु मुदित।3।

उसकी धवनि है मधुर मुरलिका सी मनहारी।
पिक काकली समान विपुलचित पुलकितकारी।
सकल अलौकिक भूति निकेतन उसका मृदुस्वर।
बरसता है सुधा सुधानिधि लौं वसुधा पर।
उसमें सुभावनाओं सहित वह रसालता है भरी।
जिसने कि पिपासा ज्ञान की जगत पिपासित की हरी।4।

कहते हैं ब्रजदेव दिखा करके कमलों को।
देवि इन विकच कुसुमों की गरिमा अवलोको।
इन जैसा अनुराग रंग में कौन रँगा है।
कौन भला यों मित्र मित्राता मधय पगा है।
मानस मोहकता मधुरता भावों की रमणीयता।
किसमें है ऐसी विकचता कोमलता कमनीयता।5।

हैं विरंचि से सुबन बंधु है विदित विभाकर।
है उसका अवलंब जगत पाता पावन कर।
रमा मन रमे सदा रमी उसमें रहती है।
शिव शिर पर चढ़ मिली उसे महिमा महती है।
मदमत्ता हुआ तो भी न वह सदा प्रेम पाता रहा।
मधुकर समान मधुअंधा भी उससे मधु पाता रहा।6।

सर उससे है परम कान्त बन शोभा पाता।
पाकर सुरभि समीर सौरभित है हो जाता।
रस लोलुप को परम मधुर रस है वह देता।
दृग को कर सुखदान बहु सुखित है कर लेता।
वह परहित रत रहकर सदा किसका हित करता नहीं।
बर विकसित रहकर कौन-सा चित विकसित करता नहीं।7।

आरंजित रविबिम्ब गगन सर रक्त कमल है।
इसीलिए अनुराग रागरंजित जल थल है।
उसकी कोमल कान्ति कान्त भू को है करती।
तरु को तृण को फलदल को है सुछबि वितरती।
वह अपनी अनुपम ज्योति से जगत तिमिर है खो रहा।
रजकण भी नव आलोक पा आलोकित है हो रहा।8।

कहें न मुख को कमल यदि न मुख बिकच बनावे।
कहें न दृग को कमल यदि न रस वह बरसावे।
कहें न कर को कमल जो न वह हितकर होवे।
कहें न पग को कमल जो न अपना मल खोवे।
यदि तज न अकोमलता बुरी समुचित कोमलता लहे।
तो किसी गात को कमल सा कोमल कोई क्यों कहे।9।

है ललामता लोक प्रीति की परम निराली।
लाली उसकी सकी जगत मुख की रख लाली।
वह ललना है बड़ी भली वह लाल भला है।
जिसने सीखी लोक बंधुता ललित कला है।
क्या रहा सलिल जैसा तरल कोई मानस बन विमल।
जो उसमें खिला मिला नहीं लोक प्रेम मंजुल कमल।10।