भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कर लो दिल को गवाह फिर कहना / राज़िक़ अंसारी

Kavita Kosh से
द्विजेन्द्र द्विज (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 07:24, 14 जून 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राज़िक़ अंसारी }} {{KKCatGhazal}} <poem>कर लो दि...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कर लो दिल को गवाह फिर कहना
ख़ुद को तुम बे गुनाह फिर कहना

मेरे बारे में जो भी कहना है
मुझ से कर ले निबाह फिर कहना

कुछ फक़ीरों से गुफ़्तगू कर ले
ख़ुद को तू बादशाह फिर कहना

दोस्ती इम्तिहान में रख दे
कौन है ख़ेर ख़्वाह फिर कहना

शेर कहना है ठीक है लेकिन
कर ले दिल को तबाह फिर कहना