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कलियों की तरह मेरी, गमकेगी ज़िंदगी / अवधेश्वर प्रसाद सिंह

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कलियों की तरह मेरी, गमकेगी ज़िंदगी।
बागों की बहारों में झूमेगी ज़िंदगी।।

अपने तो सदा गढ़ते मुझपर ही तोहमतें।
टूटेंगे नहीं फिर भी, निखरेगी ज़िंदगी।।

कोशिश तो हुई है ही, लिखने की ये ग़ज़ल।
महफ़िल की इनायत से, सुधरेगी ज़िंदगी।।

श्रोता जो हमारे हैं, सुनते हैं शायरी।
सुनकर ये ग़ज़ल अबकी, बदलेगी ज़िंदगी।।

पढ़ते हैं किताबों में, लिखते हैं बन्दगी।
औरों की तरह अपनी चमकेगी ज़िंदगी।।