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कल्पना परम से जुड़ी / प्रगति गुप्ता

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कितना मुश्किल है माँ बन
इस काया के चोले को छोड़ना
कितना मुश्किल है उस पल,
परम के आदेश को सहर्ष ही
निसहाय महसूस करके भी
अंतः से-
इस निमित्त को स्वीकारना...
भरकर जो भावों से
नेह के रिश्तों का सर्जन करवाता
हर रिश्ते को मजबूती देने में
प्रेम के धागों की बिनाई करवा
कड़ी दर कड़ी एक अनूठी
रिश्तों की शृंखला बनवाता,
रखता मुख्य डोर को वह
अपने ही हाथ,
भरते ही बहीखाता
कर्मो का उस जीव का
कर हस्ताक्षर यह परम
खींच डोर उस जीव का,
भूलोक से अपने लोक बुलाता...
पुनः थमाता कोई और
लेखा-जोखा नए कर्मों का और
अपने मन की-सी करवाता...
रखता सर्जन हेतु
संग-संग अपने जिसे परम
उसी माँ के भावों की डोर
वह स्वयं ही काटता...
कितना मुश्किल माँ होकर
अपने और अपने जायों को छोड़ना
और कितना अधिक मुश्किल
उस परम के लिए भी
अपने सर्जन को,
अनंत से भावों से भरना,
और उस माँ की डोर को
कठपुतलियों के जैसे साधना
फिर पूर्ण उसके कर्म होते ही
उसको भावों से रीता कर
नेह मोह त्याग
परम के पास पुनः निर्विकार
बिना किसी शिकायत लौटा पाना ...