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कविता-गीति / बसन्तजीत सिंह हरचंद

मन में पावन पग री !
द्युतिमय सब जग-मग री !

कविते ! है चरण-ध्वनि
तेरी नव मंद सुनी ,
मैं हूँ कुछ नहीं गुणी
डोल रहा डग -मग री !

नये -नये अर्थ सजे
सरस भाव लाज लजे ,
झनक अनुप्रास बजे
गीत उठा है जग री !

तुमने जो मुझे चुना
शब्द बुना ,छंद बुना ,
धन्य हुआ पुन:-पुन:
मेरा जीवन-जग री !!

(चल, शब्द बीज बोयें, २००६)