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कहाँ चमन में बहार बाटे वसंत आके कहाँ छिपल ना / सूर्यदेव पाठक 'पराग'

कहाँ चमन में बहार बाटे, वसंत आ के कहाँ छिपल बा
कली-कली के उदास मन बा, कवन इहाँ अब हवा चलल बा

अगर बढ़े के उछाह होखे, भुजा के अपना करीं भरोसा
समय के साथे कदम बढ़ाईं ई वक्त मुँहजोर बेकहल बा

दहत मिले ना लहर में मोती, बटोरलीं सीप चाहें घोंघा
अगर तमन्ना बा मोतियन के, जरूरी पहुँचल समुद्र तल बा

सुना रहल बाँसुरी सुरीला, रे मन हिरन ! दिल के थाम रह तू
छिपल कहीं बा शिकार खातिर, चतुर शिकारी के मन में छल बा

रहन सहन सब भुला गइल बा, जबान तकले रहल ना आपन
बदल रहल आदमी बराबर, करत रहल आज ले नकल बा