Last modified on 23 अप्रैल 2010, at 20:50

कहानी की तकमील / सफ़दर इमाम क़ादरी

दाएँ पहाड़ पर मिट्टी है
बाएँ ऊँचे-ऊँचे पेड़
आगे गहरी खाई
आँखें जब ऊपर करता हूँ
बादल झुक कर पर्वत पर
अपने नाज़ुक होंठों से
लम्स<ref>स्पर्श</ref> का नज़राना<ref>दान-दक्षिणा</ref> टपकाते हैं
एक कहानी पूरी हो जाती है

शब्दार्थ
<references/>