भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"क़बीले के नहीं सरदार अब तुम / राज़िक़ अंसारी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राज़िक़ अंसारी }} {{KKCatGhazal}} <poem>क़बीले...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

07:04, 14 जून 2019 के समय का अवतरण

क़बीले के नहीं सरदार अब तुम
करो तस्लीम अपनी हार अब तुम

तुम्हें पब्लिक में जाकर बैठना है
कहानी में नहीं किरदार अब तुम

ख़रीदारों में दिलचस्पी नहीं है
खड़े हो क्यों सरे बाज़ार अब तुम

सहारे के लिए बैठे हो कब से
उठाओ ख़ुद ही अपना बार अब तुम

तुम्हारी उम्र तुम से कह रही है
पढ़ो घर बैठ कर अख़बार अब तुम