भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कानय मोन आ हँसय ठोर ई / धीरेन्द्र

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ३ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:01, 23 मई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=धीरेन्द्र |संग्रह=करूणा भरल ई गीत...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कानय मोन आ हँसय ठोर ई,
संगिनि जानि गेलहुँ अछि हम।
अयला बहुतो अपन अहाँकें
आइ बनल छयि आन,
के अछि कतबा दिनकेर संगी
से नहि हमरा भान।
तैं चलितहिं रहब निरन्तर
ई तँ ठानि लेलहुँ अछि हम।
लक्ष्य दूर अछि राति अन्हरिया
ठामक नहि अछि ज्ञान,
मोनक गप्प कहू ककरासँ
आर न केओ अछि आन।
जिनगीमे आराम लिखल नहि,
ई तँ मानि गेलहुँ अछि हम।