Last modified on 5 अप्रैल 2012, at 14:26

किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे / आशीष जोग


किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे,
यही सवाल मुझे रात दिन सताता रहा |

ज़िक्र मेरा वो कभी चाहे करें या ना करें,
मेरा ख्याल उन्हें बार बार आता रहा |

ग़मों के पार भी तो ज़िन्दगी की बस्ती है,
अश्क बहते गए और मैं मुस्कुराता रहा |

सोचा के दिल की बात तुम्हें ख़त में बयां करूँ,
शब भर तेरा ही नाम लिखता मिटाता रहा |