भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

केत्ता डरबऽ / शेष आनन्द मधुकर

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:39, 11 अप्रैल 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=शेष आनन्द मधुकर |अनुवादक= |संग्रह=...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तूँ आग लगावऽ पानी में,
चिनगारी उठे जवानी से,
परलय बन जा केत्ता डरबऽ,
बबुआ ई आंधी पानी से।

ओ ही मँहगी हव, जेकरा तर,
हड्डी पिस के बुकनी बनलो,
अप्पन चेहरा तूँ, देखलऽ न,
कइसन घिस के चुकनी बनलो।

ओने किसान हे परेसान,
न बीज मिले न खाद मिले,
एने हव गजब मिलावट कि
कुछो खा लऽ न स्वाद मिले।

कह देबो सब जो तोरा से,
मुँह फाड़ देबऽ हैरानी से,
परलय बन जा केत्ता डरबऽ,
बबुआ ई आंधी पानी से।

नेता, बड़कन आउ पुलिस,
सभे एके तीरथ के पंडा हे,
घोटाला, भ्रष्टाचार भरल,
माथा पर मगर तिरंगा हे।

पसरल हे सगरो उग्रवाद,
भर गेल मउत हर गाँव-गाँ,

बेकारी, भूख जिये न दे,
हिंसा के बढ़ल हजार पाँव।

बारूदी मउत ओने मारे,
जिनगी मारऽ हे पानी से,
परलय बन जा केत्ता डरबऽ,
बबुआ ई आंधी पानी से।

तोहर नस में बिजली दउड़े,
तू काहे मुँह लटकवले हऽ,
अप्पन मंजिल के पहचानऽ,
काहे मन के भटकवले हऽ।

गंदगी देश के दूर करऽ,
सब भ्रष्टाचार के खतम करऽ,
सुख, सांति और बिसवास भरे,
दुनियां में अइसन करम करऽ।

तोहर पहचान बने केवल,
योद्धा के अमर कहानी से,
परलय बन जा, केत्ता डरबऽ,
बबुआ ई आंधी पानी से।