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केशव (रीतिकालीन कवि)
Kavita Kosh से
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केशव | |
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| जन्म स्थान | |
| कुछ प्रमुख कृतियाँ | |
| विविध | रीतिकाल के कवि |
| जीवनी | केशव (रीतिकालीन कवि) / परिचय |
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- एक भूत में होत, भूत भज पंचभूत भ्रम / केशव.
- पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो / केशव.
- दुरिहै क्यों भूखन बसन दुति जोबन की / केशव.
- नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै / केशव.
- कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक पर / केशव.
- सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै / केशव.
- मैन ऎसो मन मृदु मृदुल मृणालिका के / केशव.
- जौँ हौँ कहौँ रहिये तो प्रभुता प्रगट होत / केशव.
- पवन चक्र परचंड चलत, चहुँ ओर चपल गति / केशव.
- रितु ग्रीषम की प्रति बासर केशव, खेलत हैं जमुना-जल में / केशव.