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कोई तो मन खोले / राजेश श्रीवास्तव

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कोई तो मन खोले

बंद हैं कपाट तो बंद रहे लेकिन
काश कोई तो अपना मन खोले।

व्यथा है यह लज्जा अथवा डर की
हम देख नहीं पाते कमियां अंतर की
बाहर ढूंढते हैं समाधान उनका
समस्याएं हैं जो केवल भीतर की

दोष उजाले का क्या है, हमने यदि
द्वार बंद किए, वातायन खोले।
बंद हैं कपाट तो बंद रहे लेकिन
काश कोई तो अपना मन खोले।

स्वार्थ अधिक, परमार्थ कम देखते हैं,
स्वप्नजीवी हैं, यथार्थ कम देखते हैं
कृष्ण दिव्यदृष्टा हैं कुछ भी छुपा नहीं,
लेकिन हम हैं पार्थ, कम देखते हैं

मन तक कितना पहुंचा ईश्वर जाने
योग पर कितना मनमोहन बोले।
बंद हैं कपाट तो बंद रहे लेकिन
काश कोई तो अपना मन खोले।