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कोयल, कव्वा और गिद्ध / हरीश करमचंदाणी

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एक कव्वे ने जोर से कांव -कांव की
और गर्दन फुलाकर बोला ,
सुना कितना मीठा गाता हूँ मैं
कोयल सहित सभी पक्षी सुनते रहे
जिन पछियों ने सुरीली आवाज नही सुनी थी
या जिन्हे पहचान न थी सुर की शायद
या फिर पता नही क्यूं
वे मान गए हाँ कितना मीठा गीत
कोयल ने तब पुकारा धीमे -धीमे कुहू -कुहू
कव्वे ने इतने जोर से की कांव- कांव
की दब गई वह मधुर तान
नहीं , मुझे शिकायत कव्वे से नहीं
उसका तो यही धर्म था और स्वार्थ भी
मुझे कोयल से भी नहीं कहना है कुछ
उसे सुना ही नहीं गया
बाकी पंछियों को क्या हुआ था
क्या वे कव्वे की तीखी नुकीली चोंच से
डर गए थे
या की उन्हें भी नहीं था मालूम
फर्क मीठे और कड़वे का
और उस बेडौल पछी का मत कहिये
वह तो गिद्ध था