भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कोरे थे पन्ने / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Kavita Kosh से
वीरबाला (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:33, 9 सितम्बर 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' |संग्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

346
बाण न बींधे,
मन करे छलनी
बातों की चोट!
347
पाप न किया,
फिर भी दे दी सजा,
माफ़ न किया!
348
सब सहेंगे,
साँसें हैं जब तक,
चुप रहेंगे।
349
लकीरें मिटीं,
तक़दीर क्या पढ़ें.
कोरे थे पन्ने ।
350
कुछ न किया,
इल्ज़ाम था जितना,
सिर पे लिया।