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"कोशिश / अनिता भारती" के अवतरणों में अंतर

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बुनियादी तौर पर हर औरत
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इक औरत
मन से स्वतन्त्र होती है,
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जो दिखती है  
उसे नहीं भाता ढोंग
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या बनती है
पर फिर भी करती है।
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लम्बी टिकुली, चूड़ी भरे हाथ
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वह कभी बनना
सिन्दूर सिक्त माथा
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नहीं चाहती
उसे कभी नहीं लुभा पाता
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भूमिकाओं में बंधना
फिर भी करती है अभिनय--
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नहीं चाहती
इसमें रचे- बसे रहने का
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शायद...
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उसके ज़मीर को
यही रास्ता शेष है उसके जीने का।
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जज़ीरों में बाँधकर
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पुरजोर कोशिश की जाती है
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कि वह बने औरत
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बस खालिस औरत
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भूमिकाओं में बंधा
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उसका मन
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रोता है
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चक्की के पाटों में पिसा
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लड़ती है वह अपने से हज़ार बार
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रोती है ढोंग पर  
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धिक्कारती है वह 
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अपने औरतपन को---
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मेरी मानो,
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उसे एक बार छोड़ के देखो
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उतारने दो उसे  
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अपने भेंड़ के चोले को
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फिर देखो
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कि वह बहती नदी है
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एक बार वह गयी तो   
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फिर हाथ नहीं आयेगी
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हाथों से फिसल जायेगी।
 
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09:45, 13 जुलाई 2013 के समय का अवतरण

इक औरत
जो दिखती है
या बनती है

वह कभी बनना
नहीं चाहती
भूमिकाओं में बंधना
नहीं चाहती

उसके ज़मीर को
जज़ीरों में बाँधकर
पुरजोर कोशिश की जाती है
कि वह बने औरत
बस खालिस औरत

भूमिकाओं में बंधा
उसका मन
रोता है
चक्की के पाटों में पिसा
लड़ती है वह अपने से हज़ार बार
रोती है ढोंग पर
धिक्कारती है वह
अपने औरतपन को---

मेरी मानो,
उसे एक बार छोड़ के देखो
उतारने दो उसे
अपने भेंड़ के चोले को

फिर देखो
कि वह बहती नदी है
एक बार वह गयी तो
फिर हाथ नहीं आयेगी
हाथों से फिसल जायेगी।