भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"को करू ठीके टुटल सितार हम्मर / धीरेन्द्र" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=धीरेन्द्र |संग्रह=करूणा भरल ई गीत...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
 
पंक्ति 7: पंक्ति 7:
 
{{KKCatMaithiliRachna}}
 
{{KKCatMaithiliRachna}}
 
<poem>
 
<poem>
बारह संगी दीप, अन्हरिया काटि रहल अछि।
+
को करू ठीके टुटल सितार हम्मर
जल्दी बारह दीप अन्हरिया काटि रहल अछि।
+
तैयो कि रहलहुँ गाबि हम गीत !
मानल अन्हार ने बाहरकेर, भीतरकेर,
+
नीड़हीन विहंग सत्ते भए गेलहुँ हम।
मानल ई अन्हार ने क्षणकेर, जीवनकेर।
+
विश्व-संगरमे एनाकए अनेरे असगर भेलहुँ हम।
मानल एहि अन्हारक अछि किछु ओर-छोर नहि।
+
करू करबाले जते हम, मरू अनका ले जते हम।
मानि लेल जे हमरा जीवनमे आओत गऽ अब भोर नहि।
+
मुदा निज लाभक विचारें की केलहुँ हम ??
तैयो लिखल ‘भोरूकवा’ ई तँ मानि लेलह तों,
+
जेना जे हो, नहि कहब जे फुटल अछि कप्पार हम्मर।
मरितहुँ काल ने आश गमाओल जानि लेलह तों।
+
ओना लागए जे कि भए गेल हमर जीवन तीत।
तैयो बारह दीप, ज्ञान ओना जे अन्त हमर बस माटि रहल अछि।
+
सोचल जे लोको बूझि लेतै कालक्रमसँ सत्य की अछि,
 +
रक्त-तर्पण जे करै छी ताहि पाछू तथ्य की अछि।
 +
मुद देखी आह ! जे अछि जरि रहल संसार हम्मर।
 +
जािर निज घर घूर तापी, ठीके छी हेहर मती !
 +
की करू ठीके टुटल सितार हम्मर,
 +
तैयो कि रहलहुँ गाबि हम ई गीत।
 
</poem>
 
</poem>

03:25, 23 मई 2016 के समय का अवतरण

को करू ठीके टुटल सितार हम्मर
तैयो कि रहलहुँ गाबि हम ई गीत !
नीड़हीन विहंग सत्ते भए गेलहुँ हम।
विश्व-संगरमे एनाकए अनेरे असगर भेलहुँ हम।
करू करबाले जते हम, मरू अनका ले जते हम।
मुदा निज लाभक विचारें की केलहुँ हम ??
जेना जे हो, नहि कहब जे फुटल अछि कप्पार हम्मर।
ओना लागए जे कि भए गेल हमर जीवन तीत।
सोचल जे लोको बूझि लेतै कालक्रमसँ सत्य की अछि,
रक्त-तर्पण जे करै छी ताहि पाछू तथ्य की अछि।
मुद देखी आह ! जे अछि जरि रहल संसार हम्मर।
जािर निज घर घूर तापी, ठीके छी हेहर मती !
की करू ठीके टुटल सितार हम्मर,
तैयो कि रहलहुँ गाबि हम ई गीत।