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क्या फिर से ? / रंजना भाटिया

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जाने अन्जाने, कब न जाने
प्रीत प्यार के बहाने
मेरे दिल पर तुम ने लिख दी
प्यार की एक अमिट दास्तान
उस नज़्म के लिखे शब्द
अक्सर तन्हाई में मेरी
मुझे तेरे प्रेम का राग सुनाते हैं
देखती हूँ जब भी मैं आईना
तेरे नयनो के वो प्यार भरे अक़्स
अक्सर मेरी नज़रो में उतर जाते हैं
एक मीठी सी छुअन का एहसास
भर जाता है मेरे तन मन में
और मुझे वही तेरे साथ बीते लम्हे
गुदगुदा के छेड़ जाते हैं

तभी मेरा दिल अचानक यूँ ही
किसी गहरी सोच में डूब जाता है
कि क्या तुम फिर आओगे
फिर से वही नज़्म लिखने, गुनगुनाने
और फिर से दोगे क्या कुछ लम्हे
अपनी व्यस्त ज़िंदगी के?
क्या फिर से अपनी बाहों के घेरे में छुपाओगे मुझे
डुबो दोगे क्या फिर से अपनी सांसो की सरगम में
और समेटोगे अपनी मीठी छुअन से
मेरे बिखरे हुए वजूद को ??