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"क्या बताऊं कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया / वसीम बरेलवी" के अवतरणों में अंतर

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क्या बताऊं कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,
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तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इतनी शिद्दत के साथ,
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।<br>
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जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।<br>
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ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।<br>
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चंद जज़्बाती से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,
इस दीये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।<br>
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कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ।
  
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कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ।<br>
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शिद्दत: अति,<br>
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जब्र: ज़ोर-ज़बर्दस्ती <br>
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14:44, 23 फ़रवरी 2009 का अवतरण

क्या बताऊं कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इतनी शिद्दत के साथ,
जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।

कैसे बच्चों को बताऊं रास्तों के पेचो-ख़म,
ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।

शोहरतों की नज़्र कर दी शेर की मासूमियत,
इस दीये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।

चंद जज़्बाती से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,
कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ।

शिद्दत: अति,
पेचो-ख़म: घुमाव- फिराव,
नज़्र: भेंट, उपहार,
जब्र: ज़ोर-ज़बर्दस्ती