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क्या सोचते रहते हो तस्वीर बना कर के / सिराज अजमली

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क्या सोचते रहते हो तस्वीर बना कर के
क्यूँ उस से नहीं कहते कुछ होंट हिला कर के

घर उस ने बनाया था इक सब्र ओ रज़ा कर के
मिट्टी में मिला डाला एहसान जता कर के

जो जान से प्यारे थे नाम उन ने ही पूछा है
हैरान हुआ मैं तो इस शहर में आ कर के

तहज़ीब-ए-मुसल्ला से वाक़िफ़ ही न था कुछ भी
और बैठ गया देखो सज्जादे पे आ कर के

मुद्दत से पता उस का मालूम नहीं कुछ भी
मशहूर बहुत था जो आशुफ़्ता-नवा कर के