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खंड-22 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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सावन में जबसे दिया, प्रभु शिव को सब भार।
कम्पन ज्वर अब है नहीं, बचा नहीं अतिसार।।
बचा नहीं अतिसार, शेष है अति दुर्बलता।
पहले से हूँ ठीक, नहीं है अब व्याकुलता।।
जपता हूँ शिव नाम, बोल बम अति मनभावन।
दुःख हुए सब दूर, जयति जय शिवमय सावन।।

वैसे तो यह देश है, वीरों से आबाद।
हुए क्रान्तिकारी बड़े, भगतसिंह, आजाद।
भगतसिंह, आजाद, बने आदर्श हमारे।
उनका अद्भुत शौर्य, देखकर गोरे हारे।।
जीवन का उत्सर्ग, देश भूलेगा कैसे।
अनगिन ऐसे वीर, हुए भारत में वैसे।।
 
उनका था साहित्य में, जो व्यक्तित्व विराट।
पूरा जग कहता उन्हें, उपन्यास सम्राट।।
उपन्यास सम्राट, मात्र वे ही कहलाए।
लिखना कथ्य यथार्थ, मार्ग सारे दिखलाए।
हमसब भी तो आज, अनुसरण करते जिनका।
प्रेमचन्द साहित्य, अमर है जग में उनका।।
 
सारी कृतियाँ श्रेष्ठ हैं, सर्वश्रेष्ठ गोदान।
प्रेमचन्द का नाम है, अपने आप महान।।
अपने आप महान, पढ़ें हम श्रेष्ठ निर्मला।
ईदगाह या कफन, बड़ी है एक शृंखला।
भाषा सरल सुबोध, कथ्य है सबमें भारी।
उपन्यास सम्राट, कहे यह दुनिया सारी।।
 
जबतक प्रियतम साथ हैं, तबतक है आनन्द।
एकाकी में सर्वदा, खुशियाँ रहतीं मन्द।।
खुशियाँ रहतीं मन्द, साथ किस्मत से मिलता।
मरु स्थल में भी पुष्प, स्नेह के प्रतिपल खिलता।।
बिन साथी एकान्त, मृत्यु सम जीना कबतक।
सुख भोगो भरपूर, संग मिलता है जबतक।।
 
करता हूँ मैं मंच पर, कविता से शुरुआत।
करूँ अपेक्षा आज हो, कविताओं की बात।।
कविताओं की बात, करें फिर आप समीक्षा।
जिज्ञासा हो शान्त, नहीं है कठिन परीक्षा।।
कह “बाबा” कविराय, ज्ञान जब नित्य सँवरता।
हो जब श्रद्धा भाव, जगत भी इज्जत करता।।

नतमस्तक हम आप क्या, पूरा हिन्दुस्तान।
विस्मृत हो सकता नहीं, वीरों का बलिदान।।
वीरों का बलिदान, मिली जिससे आजादी।
हैं जब वीर जवान, नहीं होगी बर्बादी।।
है विकास चहुँओर, सफलता देती दस्तक।
सम्मुख हो जब शौर्य, सभी रहते नतमस्तक।।
 
दुनिया की यह रीति है, सदा बदलना रंग।
गिरगिट भी यह देखकर, रह जाता है दंग।।
रह जाता है दंग, मनुज हैं हमसे आगे।
जो कर ले विश्वास, स्वयं को समझ अभागे।।
प्रेमचन्द के पात्र, रो रहे होरी धनिया।
चकित न हों हमआप, रंग जब बदले दुनिया।।
 
रंग बदलना हो गया, मानवजन्य स्वभाव।
एकनिष्ठ इन्सान का, क्यों है आज अभाव?
क्यों है आज अभाव, सोचकर आप बताएँ।
उसकी जड़ है स्वार्थ, इसे हम प्रथम घटाएँ।।
गिरने पर हमलोग, प्रथम लें सीख सँभलना।
गिरगिट भी हैरान, भुलाया रंग बदलना।।
 
वैसे जग में दुख कई, भोग रहे इन्सान।
सर्वप्रथम इस भूख का, खोजे लोग निदान।।
खोजे लोग निदान, भूख है अति बलशाली।
सब होते लाचार, पेट जब रहता खाली।।
कहो नियम या शास्त्र, सुनेंगे भूखे कैसे।
प्रथम पेट की आग, बुझे सब सोचे वैसे।।