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ख़िराज-ए-अक़ीदत / आशा कुमार रस्तोगी

बिन कह के कुछ भी, सब, कोई बयान कर गया,
चुपके से कोई, मुल्के-जाँ-निसार कर गया।

मौक़ा भी मिल सका कहाँ, तौफ़ीक़-ए-नुमायाँ,
अपनों के सँग ग़ैरों को, अश्क़-बार कर गया।

मुस्तैद थे अवाम-ए-हिफ़ाज़त, को जो फ़क़त,
दहशत-ए-सितमगर था, फिर शिकार कर गया।

वर्दी पर जिनके दाग़ तक, लगा न ज़ीस्त भर,
आतिश-ए-धमाका, सुपुर्द-ए-ख़ाक कर गया।

माटी का चुका क़र्ज़, चला हर जवान था,
हर ख़ास-ओ-आम को वो, क़र्ज़दार कर गया।

कुछ कर के गुज़रने का, था जो हौसला जवाँ,
गुज़रा यूँ, शहादत मेँ अपना नाम कर गया।

लाएगी रँग ज़रूर शहादत, भी किसी दिन,
ख़ूँ दे के अहले-दिल को, ख़ूँ-ए-बार कर गया।

"आशा" है अब तो मुल्क-ए-हुक्मराँ से, बस यही,
बर्बाद हो वो, उनको जो बर्बाद कर गया...!